ऑफशोर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म (oVASPs): 2026 में FATF की चेतावनी, बढ़ता नियामकीय संकट

ऑफशोर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म

नई दिल्ली — वैश्विक स्तर पर वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही नियामकीय चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। नियमों की कमी, टैक्स से जुड़ी परेशानियां और कमजोर निगरानी सिस्टम इस सेक्टर को प्रभावित कर रहे हैं। मार्च 2026 में आई FATF (Financial Action Task Force) की रिपोर्ट में एक बड़े खतरे की ओर इशारा किया गया है, जिसे ऑफशोर Virtual Asset Service Providers (oVASPs) कहा जाता है।

ये ऐसे क्रिप्टो प्लेटफॉर्म हैं जो एक देश में रजिस्टर्ड होते हैं, लेकिन असल में दूसरे देशों के यूजर्स को सेवाएं देते हैं, अक्सर बिना लाइसेंस और बिना जरूरी सुरक्षा नियमों के।

क्या हैं oVASPs और क्यों बढ़ रही है चिंता

oVASPs ऐसे प्लेटफॉर्म होते हैं जो कई देशों में काम करते हैं लेकिन किसी एक देश के नियमों के दायरे में पूरी तरह नहीं आते। FATF के अनुसार, ये वैश्विक वित्तीय सिस्टम में कमजोरियां पैदा करते हैं और इनका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकी फंडिंग और धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है।

जहां रेगुलेटेड प्लेटफॉर्म KYC करते हैं और संदिग्ध लेन-देन की जानकारी देते हैं, वहीं कई ऑफशोर प्लेटफॉर्म इन नियमों से बचते हैं। इनका संचालन अलग-अलग देशों में फैला होता है, जिससे इनके खिलाफ कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।

कैसे बचते हैं ये प्लेटफॉर्म नियमों से

FATF के अनुसार, कुछ प्लेटफॉर्म नियमों को समझ नहीं पाते, लेकिन कई जानबूझकर उनसे बचते हैं। यही सबसे बड़ा खतरा है।

ऐसे प्लेटफॉर्म जटिल कंपनी ढांचा बनाकर असली मालिकों को छिपाते हैं, लोकल एजेंट्स के जरिए यूजर्स जोड़ते हैं और VPN के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं ताकि लोकेशन छिपाई जा सके। कई मामलों में केवल नाम के लिए कंप्लायंस ऑफिसर रखे जाते हैं या गलत जानकारी देकर जांच से बचने की कोशिश की जाती है।

इस तरह ये प्लेटफॉर्म सख्त नियम वाले देशों में भी आसानी से काम करते रहते हैं।

भारत के सामने क्या है चुनौती

भारत में भी ऑफशोर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं। नियमों के मुताबिक, भारत में सेवाएं देने वाले प्लेटफॉर्म को यहां मौजूद रहना जरूरी है, लेकिन कई विदेशी प्लेटफॉर्म बिना इसका पालन किए काम कर रहे हैं।

ये प्लेटफॉर्म कमजोर KYC के साथ यूजर्स को जोड़ते हैं, UPI के जरिए पैसे लेते हैं और बिचौलियों के जरिए भारतीय बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करते हैं। इससे इन्हें लागत में फायदा मिलता है और यूजर्स भी तेजी से इनकी ओर आकर्षित होते हैं।

हालांकि, भारत ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, जैसे बेहतर निगरानी, सख्त नियम और एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल। साथ ही, एक Virtual Asset Lab पर भी काम हो रहा है, जिससे निगरानी और मजबूत होगी।

FATF ने क्या दिए समाधान

FATF ने इस समस्या से निपटने के लिए देशों को मिलकर काम करने की सलाह दी है। इसमें ऑफशोर प्लेटफॉर्म की पहचान करना, उन्हें लोकल लाइसेंस लेने के लिए बाध्य करना और देशों के बीच जानकारी साझा करना शामिल है।

साथ ही, बैंकों और रेगुलेटेड क्रिप्टो कंपनियों से भी कहा गया है कि वे बिना लाइसेंस वाले प्लेटफॉर्म से दूरी बनाए रखें। जिस देश में प्लेटफॉर्म रजिस्टर्ड है और जहां वह काम कर रहा है, दोनों को मिलकर निगरानी करनी होगी।

आगे का रास्ता

ऑफशोर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म उन जगहों पर पनपते हैं जहां नियम कमजोर होते हैं या साफ नहीं होते। FATF का मानना है कि इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब सभी देश मिलकर एक मजबूत सिस्टम बनाएं।

क्रिप्टो इंडस्ट्री को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने के लिए पारदर्शिता, सख्त नियम और जवाबदेही जरूरी है।

अब बिना नियमों के काम करने वाले ऑफशोर प्लेटफॉर्म पर दबाव बढ़ रहा है। अगर क्रिप्टो सेक्टर को आगे बढ़ना है और लोगों का भरोसा जीतना है, तो नियमों का पालन करना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी हो चुका है।

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