नई दिल्ली, 2 सितंबर 2026: यूनाइटेड किंगडम डिजिटल एसेट और पेमेंट्स सेक्टर में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए अपने केंद्रीय बैंक बैंक ऑफ इंग्लैंड की भूमिका का विस्तार करने की तैयारी कर रहा है। प्रस्तावित बदलाव के तहत बैंक को वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ डिजिटल पेमेंट्स और डिजिटल मनी में नवाचार को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। इसमें स्टेबलकॉइन जैसी डिजिटल एसेट्स भी शामिल होंगी।
पेमेंट्स में इनोवेशन पर फोकस
बैंक ऑफ इंग्लैंड की मौजूदा प्रमुख जिम्मेदारी ब्रिटेन की वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता और पेमेंट सिस्टम की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, डिजिटल एसेट्स और नई पेमेंट टेक्नोलॉजी के तेजी से विकास को देखते हुए ब्रिटेन सरकार अब बैंक के दायित्वों में नवाचार को भी शामिल करना चाहती है।
प्रस्ताव के मुताबिक, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी प्राथमिकता बनी रहेगी और डिजिटल पेमेंट्स में इनोवेशन को सुरक्षा और नियामकीय सीमाओं के भीतर आगे बढ़ाया जाएगा।
यह बदलाव फाइनेंशियल सर्विसेज एंड मार्केट्स बिल में संशोधन के जरिए लाए जाने की उम्मीद है। सितंबर 2026 में हाउस ऑफ लॉर्ड्स में इस प्रस्ताव पर चर्चा होनी है। यदि संशोधन को मंजूरी मिलती है, तो बैंक ऑफ इंग्लैंड को डिजिटल पेमेंट्स और डिजिटल मनी में इनोवेशन बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों पर हर साल ब्रिटिश संसद को रिपोर्ट करनी होगी।
स्टेबलकॉइन क्यों बन रहे हैं अहम?
स्टेबलकॉइन ऐसे डिजिटल टोकन हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत स्थिर मूल्य बनाए रखने के लिए अमेरिकी डॉलर या ब्रिटिश पाउंड जैसी पारंपरिक करेंसी से जोड़ा जाता है। यह उन्हें बिटकॉइन जैसी अत्यधिक अस्थिर क्रिप्टोकरेंसी से अलग बनाता है।
उदाहरण के लिए, डॉलर से जुड़ा स्टेबलकॉइन सामान्य परिस्थितियों में लगभग 1 अमेरिकी डॉलर के आसपास मूल्य बनाए रखने का लक्ष्य रखता है। यही स्थिरता स्टेबलकॉइन को डिजिटल पेमेंट्स, अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर और सीमा-पार कारोबार के लिए संभावित रूप से उपयोगी बनाती है।
ब्रिटेन सरकार अब इस तकनीक को सिर्फ क्रिप्टो मार्केट के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का संभावित घटक मानकर देख रही है।
डिजिटल फाइनेंस हब बनने की ब्रिटेन की रणनीति
बैंक ऑफ इंग्लैंड पहले से ही यह परीक्षण कर रहा है कि स्टेबलकॉइन और ब्रिटिश पाउंड के डिजिटल संस्करण का इस्तेमाल सीमा-पार व्यापारिक भुगतान में किस तरह किया जा सकता है।
ब्रिटेन और अमेरिका ने भी सीमा-पार वित्तीय गतिविधियों में स्टेबलकॉइन के संभावित इस्तेमाल को बढ़ावा देने और अपने नियामकीय ढांचों को अधिक करीब लाने की मंशा जताई है।
यह कदम ब्रिटेन की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह खुद को डिजिटल फाइनेंस और फिनटेक के प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है।
बड़े स्टेबलकॉइन जारीकर्ताओं पर सख्त रिजर्व नियम
ब्रिटेन स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के लिए नियामकीय ढांचा तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ चुका है। 2026 की शुरुआत में बैंक ऑफ इंग्लैंड ने बड़े स्तर पर स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के लिए ऐसे नियमों को अंतिम रूप दिया, जिनके तहत उन्हें अपने स्टेबलकॉइन को समर्थन देने वाली कम से कम 30% एसेट्स केंद्रीय बैंक में जमा रखनी होंगी।
इस नियम का मुख्य उद्देश्य संभावित रन ऑन स्टेबलकॉइन के जोखिम को कम करना है। यानी अगर बड़ी संख्या में यूजर्स एक साथ अपने स्टेबलकॉइन को पारंपरिक करेंसी में बदलना चाहें, तो जारीकर्ता के पास पर्याप्त लिक्विड रिजर्व मौजूद रहें।
हालांकि, क्रिप्टो और डिजिटल एसेट इंडस्ट्री के कुछ लोगों का मानना है कि इतनी बड़ी रिजर्व आवश्यकता स्टेबलकॉइन कारोबार के लिए आर्थिक और व्यावसायिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।
इसके अलावा, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने फिलहाल किसी एक स्टेबलकॉइन जारीकर्ता के लिए अधिकतम 40 अरब पाउंड तक स्टेबलकॉइन सर्कुलेशन की सीमा तय की है।
क्या स्टेबलकॉइन पाउंड की जगह लेगा?
ब्रिटेन के इस कदम का मतलब यह नहीं है कि स्टेबलकॉइन जल्द ही लोगों की जेब में मौजूद पारंपरिक पाउंड की जगह लेने जा रहे हैं। इसके बजाय यह संकेत देता है कि ब्रिटिश सरकार डिजिटल एसेट्स और ब्लॉकचेन आधारित पेमेंट सिस्टम को भविष्य की वित्तीय व्यवस्था का गंभीर हिस्सा मान रही है।
सरकार का फोकस एक ऐसे मॉडल पर है जिसमें इनोवेशन और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के बीच संतुलन बनाया जा सके। यानी नई तकनीक को आगे बढ़ने का अवसर मिले, लेकिन इससे वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा से समझौता न हो।
भारत के लिए क्या है संकेत?
ब्रिटेन का यह कदम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत में फिलहाल स्टेबलकॉइन और अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए कोई समर्पित व्यापक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है। वहीं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी डिजिटल रुपया (e₹) के विकास और इस्तेमाल को आगे बढ़ा रहा है।
ब्रिटेन का मॉडल यह सवाल उठाता है कि नियामक नई डिजिटल एसेट टेक्नोलॉजी के पूरी तरह मुख्यधारा में आने का इंतजार करें या शुरुआती चरण में ही इसके लिए स्पष्ट नियम और निगरानी व्यवस्था विकसित करें।
खासकर ऐसे समय में जब ब्रिटेन और अमेरिका स्टेबलकॉइन रेगुलेशन में तालमेल और सीमा-पार पेमेंट कॉरिडोर के परीक्षण पर आगे बढ़ रहे हैं, भारत के सामने भी वैश्विक डिजिटल एसेट मानकों को लेकर अपनी रणनीति तय करने की चुनौती होगी।
आने वाले वर्षों में स्टेबलकॉइन सिर्फ क्रिप्टो ट्रेडिंग का माध्यम रहेंगे या वैश्विक पेमेंट सिस्टम का हिस्सा बनेंगे, यह काफी हद तक रेगुलेटर्स की नीतियों पर निर्भर करेगा। ब्रिटेन का ताजा कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है।
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