नई दिल्ली: स्टेबलकॉइन को अक्सर क्रिप्टो बाजार की अस्थिरता और पारंपरिक वित्तीय व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टो एसेट्स की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो सकता है, जबकि स्टेबलकॉइन अपनी कीमत को अमेरिकी डॉलर जैसी पारंपरिक मुद्राओं से जोड़कर अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने की कोशिश करते हैं।
इसी वजह से स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। सीमा-पार धन हस्तांतरण से लेकर कुछ देशों में रोजमर्रा के भुगतान तक, इन डिजिटल एसेट्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन इनके बढ़ते इस्तेमाल के साथ नियामकों के सामने एक अहम सवाल खड़ा हो गया है—क्या सिर्फ स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनी को नियंत्रित करना पर्याप्त है?
300 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ स्टेबलकॉइन बाजार
स्टेबलकॉइन बाजार का आकार अब 300 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। इसके साथ ही बाजार में काफी अधिक केंद्रीकरण भी देखने को मिलता है। दो प्रमुख स्टेबलकॉइन जारीकर्ता मिलकर कुल बाजार मूल्य का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं।
दुनियाभर के नियामक अब यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों को किस तरह नियंत्रित किया जाए, उनके लिए किस तरह के रिजर्व जरूरी हों और उपयोगकर्ताओं को अपने कॉइन्स को तय मूल्य पर वापस भुनाने की कितनी गारंटी मिले।
बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) की हालिया रिपोर्ट इसी मुद्दे की एक महत्वपूर्ण कमजोरी की ओर ध्यान दिलाती है।
जारीकर्ताओं पर लगाए जाते हैं कई प्रतिबंध
अधिकांश नियामक स्टेबलकॉइन जारीकर्ताओं को कुछ मुख्य गतिविधियों तक सीमित रखने की कोशिश करते हैं। इनमें स्टेबलकॉइन जारी करना, उन्हें वापस भुनाना और उनके पीछे रखे गए रिजर्व का प्रबंधन शामिल है।
इसके अलावा, जारीकर्ताओं को आमतौर पर स्टेबलकॉइन के मूल्य के अनुरूप सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाली संपत्तियां रिजर्व में रखने की आवश्यकता होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब उपयोगकर्ता अपने स्टेबलकॉइन को वापस भुनाना चाहें, तो जारीकर्ता उनके अनुरोध को पूरा कर सके।
हालांकि, बैंक और गैर-बैंकिंग कंपनियों के लिए नियामकीय दृष्टिकोण अलग हो सकता है।
बैंक और गैर-बैंक जारीकर्ताओं के लिए अलग नियम
जब बैंक स्टेबलकॉइन जारी करते हैं, तो उन्हें अक्सर ऋण देने, ट्रेडिंग और अन्य वित्तीय गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति मिलती है। इसका एक कारण यह है कि बैंक पहले से ही व्यापक विवेकपूर्ण नियामकीय निगरानी के दायरे में होते हैं और उनके पूरे कॉरपोरेट समूह की गतिविधियों पर भी नजर रखी जाती है।
इसके विपरीत, गैर-बैंकिंग स्टेबलकॉइन जारीकर्ताओं पर अधिक सख्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उन्हें क्रिप्टो लेंडिंग या तीसरे पक्ष को कस्टडी सेवाएं उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियों से दूर रखा जा सकता है।
इन नियमों का मूल उद्देश्य स्टेबलकॉइन जारी करने को अधिक जोखिम वाली वित्तीय गतिविधियों से अलग रखना है।
कॉरपोरेट समूह के स्तर पर पैदा हो सकता है नियामकीय अंतर
यहीं BIS की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण जोखिम की ओर इशारा करती है।
यदि नियम केवल उस कंपनी पर लागू होते हैं जो सीधे स्टेबलकॉइन जारी कर रही है, तो उसी समूह की दूसरी कंपनियां उन गतिविधियों को कर सकती हैं जिन पर जारीकर्ता कंपनी के लिए प्रतिबंध लगा हुआ है।
उदाहरण के तौर पर, कोई स्टेबलकॉइन जारीकर्ता एक अलग सिस्टर कंपनी के जरिए क्रिप्टो लेंडिंग या दूसरी जोखिम वाली वित्तीय गतिविधियां शुरू कर सकता है। तकनीकी रूप से स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनी नियमों का पालन करती रहेगी, लेकिन पूरा कॉरपोरेट समूह ऐसे जोखिम उठा सकता है जिन्हें रोकने के लिए नियमन बनाया गया था।
यही स्थिति नियामकीय अंतर को जन्म दे सकती है।
एक कंपनी का नुकसान पूरे स्टेबलकॉइन पर डाल सकता है दबाव
कॉरपोरेट समूह की किसी संबंधित कंपनी को बड़ा वित्तीय नुकसान होने पर उसका असर सीधे स्टेबलकॉइन जारीकर्ता पर पड़ सकता है।
यदि निवेशकों और उपयोगकर्ताओं का पूरे समूह पर भरोसा कमजोर होता है, तो स्टेबलकॉइन धारक अपने कॉइन्स को वापस भुनाने के लिए एक साथ कदम उठा सकते हैं। इससे जारीकर्ता पर अचानक बड़ी मात्रा में रिडेम्पशन मांगों को पूरा करने का दबाव आ सकता है।
ऐसी स्थिति में कंपनी को अपने रिजर्व में रखी संपत्तियों को तेजी से बेचने की जरूरत पड़ सकती है। यदि वह पर्याप्त तेजी से रिडेम्पशन पूरा नहीं कर पाती, तो इसका असर सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रह सकता और व्यापक डिजिटल एसेट बाजार में वित्तीय दबाव पैदा हो सकता है।
BIS का समाधान: पूरे कॉरपोरेट समूह की निगरानी
इस चुनौती से निपटने के लिए BIS की रिपोर्ट एक व्यापक नियामकीय दृष्टिकोण की जरूरत बताती है। इसके तहत केवल स्टेबलकॉइन जारी करने वाली इकाई के बजाय गैर-बैंकिंग जारीकर्ता के पूरे कॉरपोरेट समूह को नियामकीय दायरे में लाने पर विचार किया जा सकता है।
नियामक पूरे समूह को कुछ निर्धारित गतिविधियों तक सीमित कर सकते हैं। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि किसी अन्य वित्तीय या डिजिटल-एसेट गतिविधि में प्रवेश करने से पहले संबंधित कंपनी को नियामकीय मंजूरी लेना जरूरी बनाया जाए।
इस व्यवस्था में नियामक प्रत्येक गतिविधि के जोखिम का आकलन कर उसके अनुसार नियम और निगरानी लागू कर सकते हैं।
सीमा-पार कारोबार के कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी
स्टेबलकॉइन किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। डिजिटल एसेट होने के कारण इनका कारोबार और उपयोग कई देशों में हो सकता है।
इसलिए किसी एक देश के स्टेबलकॉइन बाजार में पैदा हुआ जोखिम दूसरे देशों के उपयोगकर्ताओं और वित्तीय बाजारों तक भी पहुंच सकता है। ऐसे में अलग-अलग देशों के नियामकों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
स्टेबलकॉइन की वैश्विक प्रकृति को देखते हुए केवल घरेलू स्तर पर बनाए गए नियम हमेशा पर्याप्त नहीं हो सकते।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?
स्टेबलकॉइन को लेकर वैश्विक नियामकीय बहस भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत लगातार वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए अपने नियामकीय दृष्टिकोण को विकसित कर रहा है। ऐसे में नीति निर्माताओं के सामने केवल स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनी के जोखिम को देखने के बजाय उसके पूरे कॉरपोरेट ढांचे पर विचार करने की जरूरत हो सकती है।
यदि किसी जारीकर्ता के लिए सख्त नियम बनाए जाते हैं, लेकिन उसी कॉरपोरेट समूह की दूसरी इकाइयां जोखिम वाली गतिविधियों को अपने स्तर पर संचालित कर सकती हैं, तो नियमन का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
भारत शुरुआत से ही ग्रुप-वाइड नियामकीय दृष्टिकोण अपनाकर इस संभावित कमी को दूर करने पर विचार कर सकता है।
स्टेबलकॉइन से आगे देखना होगा जोखिम
स्टेबलकॉइन का मूल उद्देश्य डिजिटल एसेट इकोसिस्टम में अपेक्षाकृत स्थिरता उपलब्ध कराना है। लेकिन नियामकों के लिए चुनौती यह समझना है कि अस्थिरता का स्रोत हमेशा स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनी के भीतर ही मौजूद नहीं होता।
कई बार जोखिम उस कॉरपोरेट समूह की दूसरी कंपनियों में छिपा हो सकता है, जिससे स्टेबलकॉइन जारीकर्ता जुड़ा हुआ है।
इसलिए भविष्य के नियमन में केवल कॉइन और उसके जारीकर्ता पर ध्यान देने के बजाय पूरे कॉरपोरेट समूह, उसकी गतिविधियों और उनके बीच मौजूद वित्तीय संबंधों को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऐसा व्यापक नियामकीय ढांचा डिजिटल एसेट सेक्टर में नवाचार को बनाए रखते हुए वित्तीय स्थिरता और उपयोगकर्ताओं के भरोसे की बेहतर सुरक्षा करने में मदद कर सकता है।
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