GNLU ने ‘Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation’ रिपोर्ट जारी की, क्रिप्टो नियमन के लिए विभिन्न मॉडल प्रस्तावित

GNLU ने ‘Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation’ रिपोर्ट जारी की, क्रिप्टो नियमन के लिए विभिन्न मॉडल प्रस्तावित

रिपोर्ट में क्रिप्टो एसेट्स के लिए पांच संभावित नियामक मॉडल सुझाए गए

नई दिल्ली: गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (GNLU) ने सोसायटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स (SILF) के सहयोग से मंगलवार को अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट “Crypto-Assets in India: Assessing the Case for Regulation” का औपचारिक विमोचन किया। यह कार्यक्रम नई दिल्ली के द ललित होटल में आयोजित किया गया। रिपोर्ट में भारत में क्रिप्टो एसेट्स से जुड़ी मौजूदा नीतिगत स्थिति का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है तथा एक ऐसे संतुलित नियामक ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो नवाचार, निवेशक संरक्षण और वित्तीय स्थिरता के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके।

रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल एसेट्स के लिए नियमन तय करने के मामले में भारत इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। हाल के वर्षों में सरकार ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर कराधान लागू करने तथा क्रिप्टो से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों के दायरे में लाने जैसे कदम उठाए हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र के लिए अभी तक कोई स्पष्ट और स्वतंत्र कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है, जिसके कारण बाजार से जुड़े हितधारकों के बीच नीतिगत अनिश्चितता बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेजी से विकसित हो रहे वैश्विक वेब3 पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट, व्यावहारिक और संतुलित नियामक व्यवस्था आवश्यक है।

रिपोर्ट में क्रिप्टो एसेट्स के लिए कई संभावित नियामक मॉडलों का उल्लेख किया गया है। साथ ही यह सुझाव भी दिया गया है कि जब तक व्यापक और मजबूत नियामक ढांचा विकसित नहीं हो जाता, तब तक सरकार की निगरानी में स्व-नियमन (Self-Regulation) का एक मॉडल अपनाया जा सकता है।

रिपोर्ट के विमोचन कार्यक्रम में न्यायपालिका, विधि क्षेत्र, नीति विशेषज्ञों और डिजिटल एसेट उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया और भारत में क्रिप्टो विनियमन के भविष्य पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी उपस्थित रहीं और उन्होंने डिजिटल एसेट्स से जुड़े उभरते कानूनी तथा नियामक पहलुओं पर अपने विचार रखे। अन्य प्रमुख वक्ताओं में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. आर. शाह, गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी, सोसायटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स (SILF) के अध्यक्ष डॉ. ललित भसीन तथा गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो. (डॉ.) एस. शांताकुमार शामिल रहे।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली ने कहा कि क्रिप्टो एसेट्स उस स्थिति का उदाहरण हैं जब तकनीकी नवाचार कानून बनाने की प्रक्रिया से कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि आज वैश्विक क्रिप्टो बाजार का आकार 2.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है और भारत लाखों उपयोगकर्ताओं के साथ एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इन तकनीकों के लिए ऐसा संतुलित नियमन तैयार किया जाए जो वित्तीय स्थिरता और निवेशकों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए नवाचार को भी प्रोत्साहित करे।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. आर. शाह ने कहा कि जब लगभग 12 करोड़ भारतीय पहले ही क्रिप्टो एसेट्स में निवेश कर चुके हैं, तब इस क्षेत्र को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में ऐसी तकनीकों को रोकना न तो व्यावहारिक है और न ही प्रभावी। इसलिए एक स्पष्ट नियामक ढांचे की आवश्यकता है जो पारदर्शिता सुनिश्चित करे, दुरुपयोग को रोके और निवेशकों के हितों की रक्षा करे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से होने वाली आय पर कराधान लागू करना सरकार का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम है, लेकिन व्यापक विनियमन अभी भी आवश्यक है।

गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी ने कहा कि तेजी से बदलती तकनीक के दौर में संस्थानों के लिए उभरती तकनीकों को समझना और उन पर गंभीर शोध करना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार अकादमिक संस्थान ऐसे विषयों पर अध्ययन कर नीति निर्माताओं को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

GNLU के निदेशक प्रो. (डॉ.) एस. शांताकुमार ने बताया कि यह विषय प्रारंभ में कक्षा में हुई एक चर्चा के रूप में सामने आया था, जो आगे चलकर एक राष्ट्रीय शोध पहल में बदल गया। उन्होंने कहा कि जब लगभग 12 करोड़ भारतीय बिना किसी स्पष्ट नियामक ढांचे के बावजूद क्रिप्टो एसेट्स से जुड़े हुए हैं, तब विश्वविद्यालय ने इस विषय पर व्यापक अध्ययन करने का निर्णय लिया। बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली में डेवलपर्स, एक्सचेंजों, नियामकों और विधि विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चाओं के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें पांच संभावित नियामक मॉडल प्रस्तुत किए गए हैं, जिन पर नीति निर्माता विचार कर सकते हैं।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने क्रिप्टो एसेट्स के लिए स्पष्ट नियम निर्धारित कर दिए हैं। इसके विपरीत भारत में अभी तक व्यापक ढांचे का अभाव है, जिससे नियामक अनिश्चितता बनी रहती है और इसका प्रभाव निवेश, उद्योग के विकास तथा तकनीकी नवाचार पर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में एक संतुलित नियामक दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की गई है, जिसमें संस्थागत निगरानी को मजबूत करने के साथ विभिन्न नियामक एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। साथ ही उपभोक्ता संरक्षण को मजबूत करने, वित्तीय जोखिमों को कम करने और भारत में ब्लॉकचेन आधारित नवाचार को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।

इस परियोजना का मार्गदर्शन एक सलाहकार बोर्ड द्वारा किया गया, जिसमें न्यायमूर्ति एम. आर. शाह, न्यायमूर्ति रवि त्रिपाठी, गुजरात सरकार के पूर्व मुख्य सचिव राजकुमार, पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव जे. पी. गुप्ता, पूर्व डीजीपी एवं एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक डॉ. केशव कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एस. नप्पिनाई, आईआईएम विशाखापत्तनम में डॉ. बी. आर. आंबेडकर चेयर प्रोफेसर प्रो. विजया भास्कर मरिसेट्टी, ब्लॉकचेन, एआई और फिनटेक विशेषज्ञ प्रो. एम. के. भंडारी, ऑनलाइन विवाद समाधान विशेषज्ञ चित्तु नागराजन, अधिवक्ता मिताली गुप्ता, फ्लूगेलसॉफ्ट ग्रुप के प्रबंध निदेशक कल्याणजीत हातिबारुआ तथा अभिनेता कबीर बेदी शामिल हैं।

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