नई दिल्ली, भारत के वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) सेक्टर को लेकर नियामकीय स्पष्टता की दिशा में एक अहम संकेत सामने आया है। वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने प्रस्तावित Securities Market Code Bill, 2025 पर अपनी 36वीं रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि जब तक वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए अलग और स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार नहीं होता, तब तक एक निर्धारित नियामक की निगरानी में Self-Regulatory Organisation (SRO) बनाया जाना चाहिए।
समिति की रिपोर्ट मुख्य रूप से भारत के सिक्योरिटीज मार्केट से जुड़े मौजूदा कानूनों को एकीकृत करने पर केंद्रित है। हालांकि, रिपोर्ट में VDA और डिजिटल एसेट्स से जुड़ी निवेश व्यवस्थाओं की कानूनी स्थिति को लेकर उठाए गए सवाल क्रिप्टो इंडस्ट्री के लिए खास महत्व रखते हैं।
VDA सेक्टर के लिए क्यों अहम है समिति का सुझाव?
भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से जुड़ी गतिविधियों पर फिलहाल मुख्य रूप से धन शोधन रोधी (AML) और टैक्स कानूनों के तहत प्रावधान लागू होते हैं। लेकिन क्रिप्टो और डिजिटल एसेट्स के बढ़ते इस्तेमाल के साथ निवेशकों की सुरक्षा, पारदर्शिता, संचालन और बाजार निगरानी से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
समिति ने इसी नियामकीय अंतर को देखते हुए एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में SRO मॉडल का सुझाव दिया है। इसका उद्देश्य यह हो सकता है कि व्यापक कानून बनने तक इंडस्ट्री के लिए कुछ बुनियादी मानक और आचार संहिता लागू की जा सके।
Digital Token और Securities को लेकर क्या है सवाल?
आज पारंपरिक सिक्योरिटीज, जैसे शेयर और बॉन्ड, को डिजिटल टोकन के रूप में भी पेश किया जा सकता है। ऐसी डिजिटल व्यवस्थाओं में कई निवेशकों से पूंजी जुटाई जा सकती है और उनकी संरचना कुछ मामलों में पारंपरिक निवेश योजनाओं जैसी हो सकती है।
यहीं से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या ऐसी व्यवस्था को सिक्योरिटीज मार्केट कानूनों के तहत Collective Investment Scheme या निवेश योजना माना जा सकता है।
समिति ने इसी मुद्दे पर स्पष्टता की जरूरत को रेखांकित किया है। खासकर उन डिजिटल एसेट्स और निवेश व्यवस्थाओं को लेकर, जो Distributed Ledger Technology (DLT) या ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों पर आधारित हैं।
सिर्फ Blockchain इस्तेमाल करने से कोई Asset Security नहीं बनता
वित्त मंत्रालय ने समिति के सवालों के जवाब में स्पष्ट किया कि प्रस्तावित Securities Market Code में किसी सिक्योरिटी की कानूनी पहचान केवल इस्तेमाल की गई तकनीक से तय नहीं होती।
इसका अर्थ है कि अगर कोई मूल संपत्ति कानून के तहत सिक्योरिटी नहीं है, तो उसका डिजिटल या टोकनाइज्ड रूप केवल ब्लॉकचेन या किसी अन्य तकनीक के इस्तेमाल के कारण सिक्योरिटी नहीं बन जाएगा।
किसी डिजिटल एसेट या उससे जुड़ी व्यवस्था को सिक्योरिटीज कानून के तहत लाने के लिए यह देखा जाएगा कि उसमें निवेश योजना या सिक्योरिटी की निर्धारित कानूनी विशेषताएं मौजूद हैं या नहीं।
अमेरिका और दूसरे देशों से भारत क्या सीख सकता है?
संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और यूरोपीय संघ सहित विभिन्न क्षेत्रों में डिजिटल एसेट्स के नियमन का भी उल्लेख किया है।
इन बाजारों में किसी एसेट की कानूनी स्थिति तय करते समय केवल उसकी तकनीक को आधार नहीं बनाया जाता। इसके बजाय यह देखा जाता है कि एसेट किस तरह काम करता है, उसका आर्थिक स्वरूप क्या है और वह निवेशकों को किस तरह के अधिकार या जोखिम देता है।
साथ ही, कई देशों और क्षेत्रों ने उन डिजिटल एसेट्स के लिए अलग नियामकीय ढांचे विकसित किए हैं, जो पारंपरिक सिक्योरिटीज कानूनों के दायरे में नहीं आते।
SRO मॉडल से Crypto Industry को क्या फायदा हो सकता है?
समिति का प्रस्तावित SRO मॉडल भारत के क्रिप्टो और VDA सेक्टर के लिए एक अंतरिम नियामकीय व्यवस्था के रूप में काम कर सकता है।
ऐसी संस्था के जरिए इंडस्ट्री के लिए कुछ बुनियादी मानक तय किए जा सकते हैं, जिनमें:
- कारोबार में पारदर्शिता
- निवेशक सुरक्षा
- बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस
- आचार संहिता
- नियमों का पालन
- जिम्मेदार कारोबारी प्रक्रियाएं
शामिल हो सकती हैं।
हालांकि, SRO को एक निर्धारित वैधानिक नियामक की निगरानी में काम करने का सुझाव दिया गया है। इससे इंडस्ट्री की स्व-नियमन व्यवस्था और सरकारी निगरानी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा सकती है।
Crypto Investors के लिए अभी क्या बदलेगा?
फिलहाल इस सिफारिश से आम क्रिप्टो निवेशकों के लिए कोई तत्काल कानूनी या कारोबारी बदलाव नहीं होगा। इसका कारण यह है कि संसदीय समिति की ये सिफारिशें अभी सलाहकारी प्रकृति की हैं और अपने आप में कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं।
हालांकि, यह रिपोर्ट भारत की भविष्य की क्रिप्टो और VDA नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत देती है।
जैसे-जैसे भारत में डिजिटल एसेट्स में निवेश और कारोबारी गतिविधियां बढ़ रही हैं, केवल टैक्स और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े नियम बाजार के संचालन और निवेशक सुरक्षा के सभी पहलुओं को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।
भारत में Crypto Regulation का अगला चरण?
संसदीय समिति का SRO सुझाव यह संकेत देता है कि भारत अब VDA सेक्टर के लिए केवल टैक्सेशन और AML अनुपालन तक सीमित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर बाजार संचालन, निवेशक सुरक्षा और संस्थागत गवर्नेंस पर भी ध्यान देने की दिशा में बढ़ सकता है।
हालांकि, एक व्यापक और समर्पित VDA कानून बनने में समय लग सकता है। ऐसे में नियामक की निगरानी वाला SRO मॉडल इंडस्ट्री के लिए अंतरिम ढांचे का काम कर सकता है।
क्रिप्टो बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में VDA को लेकर नियामकीय बहस अब केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रह गई है कि इन एसेट्स पर टैक्स कैसे लगाया जाए। अब चर्चा इस बात पर भी बढ़ रही है कि क्रिप्टो और डिजिटल एसेट्स के बाजार को किस तरह पारदर्शी, जिम्मेदार और निवेशक-केंद्रित तरीके से नियंत्रित किया जाए।
निष्कर्ष
संसदीय समिति की सिफारिश भारत के VDA सेक्टर के लिए एक संभावित नियामकीय रोडमैप का संकेत देती है। अभी यह कानून नहीं है और निवेशकों के लिए तत्काल कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन SRO की निगरानी वाली व्यवस्था का सुझाव बताता है कि भारत डिजिटल एसेट्स के लिए अधिक संगठित और संस्थागत नियमन की दिशा में आगे बढ़ने पर विचार कर रहा है।
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