नई दिल्ली, भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) के रेगुलेशन को लेकर नीति स्तर पर एक अहम पहल सामने आई है। वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने Securities Markets Code, 2025 पर अपनी सिफारिशों में VDA सेक्टर के लिए एक व्यापक वैधानिक और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की जरूरत पर जोर दिया है।
भारत वेब3 एसोसिएशन के अध्यक्ष दिलीप चेनॉय ने समिति की सिफारिशों का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम भारत के डिजिटल एसेट इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, समिति ने पहली बार वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को देश की व्यापक वित्तीय नियामक व्यवस्था के संदर्भ में देखते हुए मौजूदा रेगुलेटरी गैप को दूर करने की दिशा में स्पष्ट रास्ता सुझाया है।
VDA के लिए अंतरिम रेगुलेटरी व्यवस्था का सुझाव
संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि जब तक VDA के लिए व्यापक कानूनी और नियामक ढांचा तैयार नहीं होता, तब तक मान्यता प्राप्त Self-Regulatory Organisations (SROs) के जरिए अंतरिम व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। इन संस्थाओं को एक नामित रेगुलेटर की निगरानी में काम करने का प्रस्ताव है।
इस मॉडल का उद्देश्य क्रिप्टो और डिजिटल एसेट सेक्टर को पूरी तरह सेल्फ-रेगुलेशन के भरोसे छोड़ना नहीं है। इसके बजाय, मान्यता प्राप्त संस्थाओं को स्पष्ट नियमों और मानकों के तहत काम कराया जा सकता है, जबकि अंतिम निगरानी एक निर्धारित नियामक के पास रहेगी।
ऐसी व्यवस्था से व्यापक कानून बनने तक ट्रांसपेरेंसी, डिस्क्लोजर, मार्केट कंडक्ट, इन्वेस्टर प्रोटेक्शन और शिकायत निवारण जैसे क्षेत्रों में जरूरी मानक विकसित किए जा सकते हैं।
Securities Markets Code में क्यों बना रेगुलेटरी गैप?
प्रस्तावित Securities Markets Code में सिक्योरिटीज की टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल परिभाषा रखी गई है। हालांकि, VDA की कई श्रेणियां इस परिभाषा के दायरे में नहीं आतीं, क्योंकि वे कानूनी तौर पर सिक्योरिटीज या डेरिवेटिव्स की सभी जरूरी विशेषताओं को पूरा नहीं करतीं।
दूसरी ओर, डिजिटल एसेट्स का इस्तेमाल ट्रेडिंग और निवेश के लिए लगातार बढ़ रहा है। कई VDA में पारंपरिक निवेश उत्पादों जैसी आर्थिक विशेषताएं भी देखने को मिलती हैं। ऐसे में एसेट के इस्तेमाल और उसके कानूनी वर्गीकरण के बीच अंतर एक महत्वपूर्ण नियामक चुनौती बन जाता है।
यहीं से रेगुलेटरी गैप सामने आता है। अगर किसी डिजिटल एसेट का इस्तेमाल निवेश के तौर पर हो रहा है, लेकिन उसके लिए व्यापक नियम मौजूद नहीं हैं, तो मार्केट कंडक्ट, पारदर्शिता, उपभोक्ता सुरक्षा और निवेशक शिकायतों के समाधान को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
भारत में Crypto Sector पूरी तरह रेगुलेशन से बाहर नहीं
भारत में VDA सेक्टर को पूरी तरह अनरेगुलेटेड कहना सही नहीं होगा। इस क्षेत्र पर Prevention of Money Laundering Act (PMLA) और Income Tax Act के तहत महत्वपूर्ण दायित्व लागू हैं।
पंजीकृत VDA सर्विस प्रोवाइडर्स को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग, रिपोर्टिंग और टैक्स से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। इससे डिजिटल एसेट सेक्टर में वित्तीय निगरानी और अनुपालन व्यवस्था को मजबूती मिली है।
हालांकि, मार्केट कंडक्ट, ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स, डिस्क्लोजर प्रैक्टिसेज, कंज्यूमर प्रोटेक्शन और डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन जैसे क्षेत्रों में अभी भी व्यापक फ्रेमवर्क की जरूरत बनी हुई है।
Investor Protection और Innovation के बीच संतुलन जरूरी
क्रिप्टो रेगुलेशन का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ नियंत्रण का नहीं, बल्कि इन्वेस्टर प्रोटेक्शन और इनोवेशन के बीच संतुलन का भी है।
एक स्पष्ट और संतुलित नियामक व्यवस्था निवेशकों को बेहतर सुरक्षा दे सकती है। साथ ही, इससे उन कंपनियों और प्लेटफॉर्म्स को भी फायदा होगा जो पहले से मौजूदा कानूनी और अनुपालन संबंधी दायित्वों का पालन कर रहे हैं।
दूसरी ओर, अत्यधिक नियामक अनिश्चितता डिजिटल एसेट गतिविधियों को खत्म नहीं करती। ऐसी स्थिति में कारोबार और उपयोगकर्ता ऐसे विदेशी प्लेटफॉर्म्स या दूसरे बाजारों की ओर जा सकते हैं जो घरेलू नियामक दायरे से बाहर हों। इसलिए भारत के लिए ऐसा ढांचा जरूरी है जो सुरक्षा के साथ-साथ जिम्मेदार इनोवेशन को भी जगह दे।
Global Crypto Regulation में भारत की भूमिका
भारत पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल एसेट्स और ब्लॉकचेन इनोवेशन के क्षेत्र में एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है। अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान भी भारत ने क्रिप्टो-एसेट रेगुलेशन को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
अब इसी अनुभव के आधार पर घरेलू स्तर पर एक संतुलित और भविष्य के अनुरूप VDA रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करना भारत की वैश्विक स्थिति को और मजबूत कर सकता है।
सरकार के सामने अब बड़ा अवसर
संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशें भारत में डिजिटल एसेट रेगुलेशन को लेकर आगे की नीति चर्चा के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती हैं। समिति ने VDA सेक्टर से जुड़े अवसरों और जोखिमों दोनों को ध्यान में रखते हुए एक चरणबद्ध रास्ते का संकेत दिया है।
अब सरकार के सामने ऐसा फ्यूचर-रेडी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने का अवसर है, जो निवेशकों के हितों की रक्षा करे, मार्केट इंटीग्रिटी बनाए रखे और जिम्मेदार डिजिटल एसेट इनोवेशन को बढ़ावा दे।
अगर भारत इस दिशा में स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक नियम तैयार करता है, तो इससे न केवल VDA निवेशकों का भरोसा मजबूत हो सकता है, बल्कि देश के Web3 और ब्लॉकचेन इकोसिस्टम के सतत विकास के लिए भी मजबूत आधार तैयार हो सकता है।
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